الجمعة، 28 أكتوبر 2011

हज्ज की तात्कालिक अनिवार्यता




हज्ज की तात्कालिक अनिवार्यता

क्या हज्ज पर सक्षम आदमी के लिए कई वर्षों तक हज्ज को विलंब करना जाइज़ है ?



हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान अल्लाह के लिए योग्य है।

जो आदमी हज्ज करने की ताक़त रखता है और उसके अंदर हज्ज के अनिवार्य होने की शर्तें पूरी हैं, तो उस पर तत्कालीन हज्ज करना अनिवार्य है, और उसके लिए उसे विलंब करना जाइज़ नहीं है।

इब्ने क़ुदामा रहिमहुल्लाह ने "अल-मुग़्नी" में फरमाया:

"जिस आदमी पर हज्ज वाजिब हो गया और उसके लिए उसको करना संभव है, तो उस पर वह तत्कालीन ही अनिवार्य है और उसके लिए उसे विलंब करना जाइज़ नहीं है। यही बात इमाम अबू हनीफा और इमाम मालिक ने भी कही है। इस कथन का आधार अल्लाह तआला का यह फरमान है:

﴿وَلِلهِ عَلَى النَّاسِ حِجُّ الْبَيْتِ مَنِ اسْتَطَاعَ إِلَيْهِ سَبِيلًا وَمَنْ كَفَرَ فَإِنَّ اللهَ غَنِيٌّ عَنِ الْعَالَمِينَ    [آل عمران : 97]

"अल्लाह तआला ने उन लोगों पर जो उस तक पहुँचने का सामर्थ्य रखते हैं इस घर का हज्ज करना अनिवार्य कर दिया है, और जो कोई कुफ्र करे (न माने) तो अल्लाह तआला (उस से बल्कि) सर्व संसार से बेनियाज़ है।" (सूरत आल-इम्रान: 97)

और अम्र (अर्थात् आदेश) तुरंत करने के लिए होता है। तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से वर्णित है कि आपने फरमाया: "जो आदमी हज्ज का इरादा करे तो उसे जल्दी करनी चाहिए।" इसे इमाम अहमद, अबू दाऊद और इब्ने माजा ने रिवायत किया है। तथा अहमद और इब्ने माजा की रिवायत में है कि: "क्योंकि आदमी बीमारी से ग्रस्त हो सकता है, सवारी गायब हो सकती है और आदमी को कोई आवश्यकता घेर सकती है।" अल्बानी ने सहीह इब्ने माजा में इसे हसन कहा है।" कुछ संशोधन के साथ अंत हुआ।

अम्र (आदेश) के तत्कालीन होने का अर्थ यह है कि: मुकल्लफ आदमी के ऊपर उस चीज़ को करना जिसका उसे आदेश दिया गया है मात्र उसके करने पर सक्षम होतो ही करना अनिवार्य है, और उसके लिए बिना किसी उज़्र (कारण) के उसे विलंब करना जाइज़ नहीं है।

तथा शैख इब्ने उसैमीन रहिमहुल्लाह से प्रश्न किया गया कि: क्या हज्ज की अनिवार्यता तत्कालीन है या विलंब के साथ है ?

तो उन्हों ने उत्तर दिया:

"सहीह बात यह है कि वह तत्कालीन अनिवार्य है, और यह कि उस मनुष्य के लिए जो अल्लाह के पवित्र घर का हज्ज करने पर सक्षम है, उसे विलंब करना जाइज़ नहीं है। इसी प्रकार सभी शरई वाजिबात (धार्मिक कर्तव्य) यदि वे किसी समय या कारण के साथ मुक़ैयद नहीं हैं तो वे तत्कालीन (तुरंत) ही अनिवार्य हैं।"

फतावा इब्ने उसैमीन (21/13).


हज्ज की फज़ीलत


     

हज्ज की फज़ीलत

क्या हज्ज मबरूर बड़े गुनाहों को क्षमा कर देता है ?



हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान अल्लाह के लिए योग्य है।

सहीहैन (सहीह बुखारी व सहीह मुस्लिम) में अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से साबित है कि उन्हों ने कहा कि मैं ने अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को फरमाते हुए सुना: "जिस व्यक्ति ने हज्ज किया और (उसके दौरान) संभोग (और कामुक वार्तालाप) तथा गुनाह और नाफरमानी (पाप एंव अवज्ञा) नहीं किया तो वह उस दिन के समान निर्दोष हो जाता है जिस दिन कि उसकी माँ ने उसे जना था।" सहीह बुखारी (हदीस संख्या: 1521) सहीह मुस्लिम (हदीस संख्या: 1350)

तथा आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया:

"एक उम्रा से दूसरा उम्रा, उनके बीच के गुनाहों का कफ्फारा (परायश्चित) है, और मबरूर हज्ज का बदला जन्नत ही है।" इसे बुखारी (हदीस संख्या: 1773) और मुस्लिम (हदीस संख्या: 1349) ने रिवायत किया है।

अतः हज्ज और उसके अतिरिक्त अन्य नेक काम गुनाहों को मिटाने के कारणों में से हैं, यदि बंदा उन्हें उनके शरई तरीक़े के अनुसार अंजाम देता है। विद्वानों की बहुमत (जम्हूर उलमा) इस बात की ओर गयी है कि नेक कार्य (आमाले सालिहा) केवल छोटे गुनाहों को मिटाते हैं। जहाँ तक बड़े गुनाहों की बात है तो उनके लिए तौबा करना ज़रूरी है। उन्हों ने उस हदीस से दलील पकड़ी है जिसे मुस्लिम ने अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया:

"पाँच समय की नमाज़ें, एक जुमा से दूसरा जुमा और एक रमज़ान से दूसरा रमज़ान, उनके बीच होने वाले गुनाहों के लिए कफ्फारा हैं यदि बड़े गुनाहों से बचा जाये।" इसे मुस्लिम (1/209) ने रिवायत किया है।

जबकि इमाम इब्नुल मुंज़िर रहिमहुल्लाह और विद्वानों का एक समूह इस बात की तरफ गया है कि हज्ज मबरूर सभी गुनाहों को मिटा देता है, उन्हों ने उपर्युक्त दोनों हदीसों के प्रत्यक्ष अर्थ से दलील पकड़ी है।

और अल्लाह तआला ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान रखता है।

देखिये: इफ्ता और वैज्ञानिक अनुसंधान की स्थायी समिति का फतावा (11/13).






हज्ज का हुक्म


हज्ज का हुक्म

हज्ज का हुक्म क्या है, तथा उसकी अनिवार्यता का इंकार करने वाले का क्या हुक्म है ?

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान अल्लाह के लिए योग्य है।

हज्ज इस्लाम के स्तंभों में से एक स्तंभ है। अतः जिस आदमी ने उसका इंकार किया या उससे द्वेष और बुग़्ज़ रखा तो वह काफिर है, उस से तौबा करवाया जायेगा, यदि वह तौबा कर लेता है तो ठीक है, अन्यथा उसे क़त्ल कर दिया जायेगा। तथा हज्ज करने पर सक्षम आदमी के ऊपर अनिवार्य है कि वह हज्ज के फरीज़ा की अदायगी में शीघ्रता से काम ले ; क्योंकि अल्लाह तआला का फरमान है:

 ﴿وَلِلهِ عَلَى النَّاسِ حِجُّ الْبَيْتِ مَنِ اسْتَطَاعَ إِلَيْهِ سَبِيلًا وَمَنْ كَفَرَ فَإِنَّ اللهَ غَنِيٌّ عَنِ الْعَالَمِينَ    [آل عمران : 97]

"अल्लाह तआला ने उन लोगों पर जो उस तक पहुँचने का सामर्थ्य रखते हैं इस घर का हज्ज करना अनिवार्य कर दिया है, और जो कोई कुफ्र करे (न माने) तो अल्लाह तआला (उस से बल्कि) सर्व संसार से बेनियाज़ है।" (सूरत आल-इम्रान : 97)

और अल्लाह तआला ही तौफीक़ प्रदान करने वाला है।

इफ्ता और वैज्ञानिक अनुसंधान की स्थायी समिति के फतावा (11/11).

الجمعة، 2 سبتمبر 2011

शव्वाल के छः रोज़ों की फज़ीलत

 शव्वाल के छः रोज़ों की फज़ीलत
प्रश्न :
शव्वाल के छः रोज़ों की क्या फज़ीलत है, और क्या यह अनिवार्य है ?
उत्तर :
हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।
रमज़ान के फर्ज़ (अनिवार्य) रोज़े के बाद शव्वाल के छः दिनों का रोज़ा रखना एक स्वैच्छिक सुन्नत है अनिवार्य नहीं है, और मुसलमान के लिए शव्वाल के छः रोज़े रखना धर्म संगत है और इसके अंदर बहुत फज़ीलत और बड़ा पुन्य है। क्योंकि जो व्यक्ति इसका रोज़ा रखेगा उसको पूरे एक वर्ष का रोज़ा रखने का अज्र व सवाब मिलेगा, जैसाकि यह बात मुसतफा सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्रमाणित है, जैसाकि अबू अय्यूब रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस में है कि अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : जिस व्यक्ति ने रमज़ान के रोज़े रखे और उसके बाद ही शव्वाल का छः रोज़े रखे तो यह ज़िंदगी (ज़माने) भर रोज़ा रखने के समान है। इसे मुस्लिम, अबू दाऊद, तिर्मिज़ी, नसाई और इब्ने माजा ने रिवायत किया है।
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इसकी व्याख्या अपने इस फरमान के द्वारा की है : जिसने ईदुल फित्र के बाद छः दिनों का रोज़ा रखा तो वह पूरे साल रोज़ा रखने की तरह है : जो व्यक्ति नेकी करेगा तो उसके लिए उसके समान दस गुना (सवाब) है। तथा एक रिवायत में है कि : अल्लाह तआला ने नेकी को उसके दस गुना के बराबर कर दिया है, तो एक महीना दस महीने के बराबर है, और छः दिनों का रोज़ा पूर वर्ष के बराबर है। (नसाई, इब्ने माजा), और वह सहीह तर्गीब व तर्हीब (1/421) में है, तथा इब्ने खुज़ैमा ने उसे इन शब्दों के साथ रिवायत किया है : रमज़ान के महीने का रोज़ा उसके दस गुना के बराबर है और छः दिनों का रोज़ा दो महीने के बराबर है, तो यही साल भर का रोज़ा है।
तथा शाफईया और हनाबिला के फुक़हा ने इस बात को स्पष्ट रूप से वर्णन किया है कि : रमज़ान के बाद शव्वाल के छः दिनों का रोज़ा रखना एक साल फर्ज़ रोज़ा रखने के बराबर है, अन्यथा अज्र व सवाब का कई गुना बढ़ा दिया जाना तो सामान्य रूप से नफली रोज़ो में भी प्रमाणित है क्योंकि नेकी को बढ़ाकर उसके दस गुना बराबर कर दिया जाता है।
फिर यह बात भी है कि शव्वाल के छः दिनों का रोज़ा रखने के महत्वपूर्ण लाभों में से एक उस कमी की आपूर्ति है जो रमज़ान में फर्ज़ रोज़े के अंदर पैदा हो गई है, क्योंकि रोज़ादार इस बात से खाली नहीं होता है कि उस से कोई कोताही या ऐसा पाप न हुआ हो जो उसके रोज़े को निषेधात्मक रूप से प्रभावित न करता हो, तथा क़ियामत के दिन नवाफिल से लेकर फराइज़ की कमी को पूरा किया जायेगा, जैसाकि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : क़ियामत के दिन लोगों का उनके आमाल में से सबसे पहले नमाज़ का हिसाब लिया जायेगा, आप ने फरमाया : हमारा सर्वशक्तिमान पालनहार अपने फरिश्तों से फरमायेगा जबकि वह सर्वश्रेष्ठ ज्ञान रखता है : मेरे बंदे की नमाज़ को देखो क्या उसने उसे पूरा किया है या उसमें कमी है, यदि वह पूरी है तो पूरी लिखी जायेगी, और यदि उसमें कुछ कमी रह गई है तो अल्लाह तआला फरमायेगा : देखो, क्या मरे बंदे के पास कुछ नफ्ल है, यदि उसके पास नफ्ल है, तो अल्लाह तआला फरमायेगाः मेरे बंदे के फरीज़े को उसी नफ्ल से पूरा कर दो। फिर अन्य आमाल के साथ भी इसी तरह किया जायेगा। इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है।
और अल्लाह तआला ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान रखता है।

الثلاثاء، 30 أغسطس 2011

ईद के शिष्टाचार

ईद के शिष्टाचार

वे कौन सी सुन्नतें और शिष्टाचार हैं जिनकी हमें ईद के दिन पाबंदी करनी चाहिए
हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।
वे सुन्नतें जिनका एक मुसलमान को ईद के दिन ध्यान रखना चाहिए निम्नलिखित हैं:
1- नमाज़ के लिए निकलने से पूर्व स्नान करना:
मुवत्ता वगैरह में शुद्ध रूप से प्रमाणित है कि अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा ईदुल फित्र के दिन ईदगाह जाने से पहले स्नान किया करते थे। (अल-मुवत्ता / 428) तथा नववी रहिमहुल्लाह ने ईद की नमाज़ के लिए स्नान करने के मुस्तहब होने पर विद्वानों की सर्वसहमति का उल्लेख किया है।
तथा वह अर्थ जिसके कारण जुमा और अन्य सार्वजनिक समारोहों के लिए स्नान करना मुस्तहब करार दिया गया है वह ईद में भी मौजूद है बल्कि वह ईद में अधिक स्पष्ट रूप से पाया जाता है।
2- ईदुल फित्र में नमाज़ के लिए निकलने से पूर्व और ईदुल अज़्हा (क़ुर्बानी की ईद) में नमाज़ के बाद खाना:
ईद के शिष्टाचार में से यह है कि आदमी ईदुल फित्र में नमाज़ के लिए न निकले यहाँ तक कि कुछ खजूरें खा ले। क्योंकि बुखारी ने अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि उन्हों ने कहा : अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ईदुल फित्र के दिन नहीं निकलते थे यहाँ तक कि कुछ खजूरें खा लेते थे . . . और उन्हें ताक़ (विषम) संख्या में खाते थे। (बुखारी,  हदीस संख्या : 953)
ईदुल फित्र की नमाज़ के लिए निकलने से पूर्व खाना उस दिन रोज़ा रखने के निषेद्ध में अतिशयोक्ति करते हुए, तथा रोज़ा तोड़ने और रोज़े के समाप्त होने की सूचना देते हुए मुस्तहब करार दिया गया है।
तथा हाफिज़ इब्ने हजर ने इसका यह कारण वर्णन किया है कि इसमें रोज़े के अंदर वृद्धि करने के रास्ते को बंद करना पाया जाता है, तथा इसमें अल्लाह के आदेश का पालन करने में जल्दी और पहल करने का तत्व है। (फत्हुल बारी 2 / 446)
और जो व्यक्ति खजूर न पाए वह किसी भी जाइज़ चीज़ के द्वारा रोज़ा तोड़ दे।
जहाँ तक ईदुल अज़्ह़ा का संबंध है तो मुस्तहब यह है कि आदमी कोई चीज़ न खाए यहाँ तक कि नमाज़ से वापस आ जाए फिर अपनी क़ुर्बानी के गोश्त से खाए यदि उसके यहाँ क़ुर्बानी है, और यदि उसके यहाँ क़ुर्बानी नहीं है तो नमाज़ से पहले खाने में कोई आपत्ति की बात नहीं है।
3- ईद के दिन तक्बीर कहना:
यह ईद के दिन महान सुन्नतों में से है, क्योंकि अल्लाह तआला का फरमान है :
﴿ ولتكملوا العدة ولتكبروا الله على ما هداكم ولعلكم تشكرون ﴾ [البقرة : 185]
 और ताकि तुम गिंती पूरी कर लो, और अल्लाह के प्रदान किए हुए मार्गदर्शन के अनुसार उसकी बड़ाई (महानता) का वर्णन करो और तुम उसके आभारी बनो। (सूरतुल बक़राः 185)
तथा वलीद बिन मुस्लिम से वर्णित है कि उन्हों ने कहा : मैं ने औज़ाई और मालिक बिन अनस से ईदैन में तक्बीर का प्रदर्शन करने के बारे में पूछा तो उन दोनों ने कहा : हाँ, अब्दुल्लाह बिन उमर ईदुल फित्र के दिन उसका प्रदर्शन करते थे यहाँ तक कि इमाम बाहर निकलता था।
तथा अबू अब्दुर्रहमान अस्सुलमी से प्रमाणित है कि उन्हों ने कहा : (वे लोग ईदुल फित्र में ईदुल अज़हा से अधिक सख्त होते थे). वकीअ़ ने कहा अर्थात तक्बीर कहने में। देखिए इर्वाउल गलील (3 / 122)
तथा दारक़ुतनी वगैरह ने रिवायत किया है कि इब्ने उमर जब ईदुल फित्र के दिन और ईदुल अज़्हा के दिन निकलते थे तो तक्बीर कहने में संघर्ष करते थे यहाँ तक कि ईदगाह आते फिर तक्बीर कहते यहाँ तक कि इमाम (नमाज़ पढ़ाने के लिए) निकलता था।
तथा इब्ने अबी शैबा ने सही सनद के साथ ज़ोहरी से वर्णन किया है कि उन्हों ने कहा : (लोग ईद में जब अपने घरों से निकलते थे तो तक्बीर कहते थे यहाँ तक कि वे ईदगाह आते और यहाँ तक कि इमाम बाहर निकलता। जब इमाम निकल आता तो वे चुप हो जाते थे। फिर जब वह तक्बीर कहता तो लोग भी तक्बीर कहते थे)। देखिएः इर्वाउल गलील (2 / 121)
घर से ईदगाह की तरफ निकलने और इमाम के आने तक तक्बीर कहना सलफ (पूर्वजों) के निकट एक बहुत प्रसिद्ध बात थी, तथा मुसन्नेफीन के एक समूह जैसे कि इब्ने अबी शैबा, अब्दुर्रज़्ज़ाक़ और फिर्याबी ने किताब (अहकामुल ईदैन) में इसे सलफ के एक समूह से उल्लेख किया है, उसी में से यह उद्धरण है कि नाफे बिन जुबैर तक्बीर कहते थे और लोगों के तक्बीर न कहने से आश्चर्य करते थे, चुनाँचे वे कहते थे : (आप लोग तक्बीर क्यों नहीं कहते).
तथा इब्ने शिहाब ज़ोहरी रहिमहुल्लाह कहा करते थे : (लोग अपने घरों से निकलने से लेकर इमाम के प्रवेश करने तक तक्बीर कहते थे।)
ईदुल फित्र में तक्बीर का समय ईद की रात से शुरू होता है और इमाम के ईद की नमाज़ के लिए आने तक रहता है।
तथा ईदुल अज़्हा में तक्बीर ज़ुलहिज्जा के पहले दिन से शुरू होता है और तश्रीक़ (11-13 ज़ुलहिज्जा) के अंतिम दिन सूरज डूबने तक रहता है।
तक्बीर का तरीक़ा :
मुसन्नफ इब्ने अबी शैबा में सहीह सनद के साथ इब्ने मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि : वह तश्रीक़ (11, 12, 13 ज़ुलहिज्जा) के दिनों में यह तक्बीर कहते थे : अल्लाहु अक्बर, अल्लाहु अक्बर, ला इलाहा इल्लल्लाह, वल्लाहु अक्बर, अल्लाहु अक्बर व लिल्लाहिल हम्द (अल्लाह बहुत महान है, अल्लाह बहुत महान है, अल्लाह के सिवा कोई वास्तविक पूज्य नहीं, और अल्लाह बहुत महान है, अल्लाह बहुत महान है, और हर प्रकार की प्रशंसा केवल अल्लाह के लिए है)। तथा इसे इब्ने अबी शैबा ने दूसरी बार इसी सनद से तक्बीर (अल्लाहु अक्बर) के शब्द को तीन बार रिवायत किया है।
तथा अल-महामिली ने सहीह सनद के साथ इब्ने मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु से ही तक्बीर के ये शब्द रिवायत किए हैं : अल्लाहु अक्बर कबीरा, अल्लाहु अक्बर कबीरा, अल्लाहु अक्बर व अजल्ल, अल्लाहु अक्बर व लिल्लाहिल हम्द।” देखिए : इर्वाउल गलील (3/126)


  
4- बधाई देना :
ईद के शिष्टाचार में से अच्छी बधाई भी है जिसका लोग आपस में आदान प्रदान करते हैं उसके जो भी शब्द हों, उदाहरण के तौर पर कुछ लोगों का यह कहना : तक़ब्बलल्लाहु मिन्ना व मिन्कुम” (अल्लाह हमारे और आपके आमाल स्वीकार करे) या ईद मुबारक या इसके समान बधाई के अन्य वाक्य।
तथा जुबैर बिन नुफैर से वर्णित है कि उन्हों ने कहा : नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सहाबा जब ईद के दिन मिलते थे तो एक दूसरे से कहते थे: तुक़ुब्बिला मिन्ना व मिन्क (हम से और आपसे क़बूल किया जाए)। इब्ने हजर ने कहा है कि : इसकी इसनाद सही है। फत्हुल बारी (2/446)
बधाई देना सहाबा के निकट परिचित और प्रसिद्ध था, और विद्वानों जैसे कि इमाम अहमद वग़ैरह ने इसकी रूख्सत दी है, तथा ऐसी चीज़ें वर्णित हैं जो इस पर तर्क हैं जैसेकि अवसरों पर बधाई देने की वैद्धता, तथा सहाबा का कोई प्रसन्नता प्राप्त होने पर एक दूसरे को बधाई देना उदाहरण के तौर पर अल्लाह तआला किसी व्यक्ति की तौबा को स्वीकार कर लेता तो वे लोग उसे इसकी बधाई देते थे, इत्यादि।
इसमें कोई संदेह नहीं कि यह बधाई देना अच्छे व्यवहार और मुसलमानों के बीच अच्छे सामाजिक दर्शनों में से है।
तथा बधाई के विषय में कम से कम इतनी बात कही जा सकती है कि जो आपको ईद की बधाई दे उसे आप भी ईद की बधाई दें, और यदि वह चुप रहे तो आप भी खामोश रहें, जैसाकि इमाम अहमद रहिमहुल्लाह ने कहा है : यदि कोई मुझे बधाई देता है तो मैं उसे बधाई का उत्तर दूँगा अन्यथा मैं स्वयं आरंभ नहीं करूँगा।
5- ईद के लिए सुशोभित होना :
अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्हों ने कहा उमर ने इस्तबरक़ (मोटा रेशम) का एक जुब्बा लिया जो बाज़ार में बेचा जा रहा था, और उसे लेकर अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास और कहा, ऐ अल्लाह के पैगंबर आप इसे खरीद लें इसके द्वारा आप ईद और प्रतिनिधि मंडल के लिए अपने आपको सुशोभित करें, तो अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनसे कहाः यह ऐसे व्यक्ति का पोशाक है जिसका कोई हिस्सा नहीं है ... इसे बुखारी (हदीस संख्या : 948) ने रिवायत किया है।
तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हु के ईद के लिए सुशोभित होने की बात पर सहमति जताई किंतु उनकी उस जुब्बे को खरीदने की बात का खंडन किया ; क्योंकि वह रेशम का था।
तथा जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्हों ने कहा : नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास एक जुब्बा था जिसे आप दोनों ईदों और जुमा के दिन पहनते थे। (सहीह इब्ने खुज़ैमा : 1765)
तथा बैहक़ी ने सहीह सनद के साथ रिवायत किया है कि इब्ने उमर ईद के लिए अपना सबसे खूबसूरत कपड़ा पहनते थे।
अतः आदमी को चाहिए कि ईद के लिए निकलते समय उसके पास जो सबसे अच्छा कपड़ा हो उसे पहने।
जहाँ तक महिलाओं का संबंध है तो जब वे बाहर निकलेंगीं तो श्रृंगार से दूर रहेंगी क्योंकि उन्हें पराये मर्दों के लिए श्रृंगार का प्रदर्शन करने से मना किया गया है, इसी प्रकार जो औरत बाहर निकलना चाहती है उसके ऊपर सुगंध लगाना या पराये मर्दों को फित्ने में डालना हराम (निषिद्ध) है, क्योंकि वह उपासना और आज्ञाकारिता के लिए निकली है।
6- नमाज़ के लिए एक रास्ते से जाना और दूसरे रास्ते से वापस आना:
जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित है कि उन्हों ने कहा कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ईद के दिन रास्ता बदल देते थे। इसे बुखारी (हदीस संख्या : 986) ने रिवायत किया है।
कहा गया है कि इसकी हिक्मत (तत्वदर्शिता) यह है कि परलोक के दिन अल्लाह के पास दोनों रास्ते उसके लिए गवाही दें, तथा क़ियामत के दिन धरती, उसके ऊपर जो अच्छाई और बुराई की गई है उसको बयान करे।
तथा यह बात भी कही गई है किः यह दोनों रास्ते में इस्लाम के प्रतीक का प्रदर्शन करने के लिए है।
तथा एक कथन यह है किः यह अल्लाह के स्मरण (ज़िक्र) का प्रदर्शन करने के लिए है।
तथा कहा गया है किः यह मुनाफिक़ों (पाखंडियों) और यहूदियों को क्रोध दिलाने के लिए है और ताकि वह उसके साथ जो लोग हैं उनकी अधिकता से उन्हें भयभीत करे।
तथा यह भी कहा गया है किः ऐसा इसलिए है ताकि लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करे जैसे कि फत्वा पूछना, शिक्षा देना, अनुसरण, तथा ज़रूरतमंदों पर दान करना, या ताकि अपने रिश्तेदारों की ज़ियारत करे और अपने निकट संबंधियों के साथ सद्व्यवहार करे।
और अल्लाह तआला ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान रखता है।
इस्लाम प्रश्न और उत्तर